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سوءال |
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چـــه
خـــواهد اهـــل معنـــي زآن عـــبارت
كـــه ســـوي چشـــم و لـــب دارد اشـــارت
چــه جــويد از ســر زلــف و خــط و خــال
كســي كــه انــدر مقامــات اســت و احــوال |
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جواب |
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هـر آن
چيـزي كـه در عـالم عيان است
چـو عكسـي ز آفـتاب آن جهـان
است |
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جهـانچونزلف وخط وخال وابروست
كه هر چيزي به جاي خويش نيكوست
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٧٢٠ |
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تجلـي
گـه جمـال و گـه جـلال اسـت
رخ و
زلــف آن معانــي را مــثال اســت
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صـفات حـق تعالـي لطـف و قهـر است
رخ و زلـف بـتان را زآن دو بهـر
اسـت
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چـو
محسـوس آمـد ايـن الفاظِ مسموع
نخسـت از بهـر محسوس است موضوع |
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نـــــدارد عـــــالم معنـــــي
نهايـــــت
كجـــا بيـــند مـــر او را
لفـــظ غايـــت |
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هــر آن معنــي كــه شــد از ذوق پــيدا
كجــــا تعبيـــــر لفظــــي يابـــــد او را
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٧٢٥ |
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چـــو اهـــل
دل كـــند تفســـير معنـــي
بــــه مانــــندي كــــند تعبيــــر معنــــي |
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كه محسوساتازآن عالم چوسايه است
كـه ايـن چو نطفل
وآن ماننددايه است
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بـــه
نـــزد مـــن خـــود الفـــاظ مـــُؤَوَّل
بــــر آن معنــــي فــــتاد از وضــــع اول
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به محسوسات خاص ازعرف عام
است
چـه
دانـد عـام كـان معنـي كـدام است
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نظــر چــون در جهــانِ عقــل كــردند
از آنجــــا لفظهــــا را نقــــل
كــــردند
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٧٣٠ |
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تناســــب را رعايــــت
كــــرد عاقــــل
چــو ســوي لفــظْ معنــي گشــت نــازل
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ولـــي تشـــبيهِ كلـــي نيســـت ممكـــن
ز جسـت و جـوي آن
مـيبـاش سـاكن |
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بـدين
معنـي كسـي را بـر تـو د ق نيست
كـه صـاحبمذهب ايـنجا غير حق نيست
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ولـــي تـــا بـــا خـــودي
زنهـــار زنهـــار
عــــــباراتِ
شــــــريعت را نگــــــهدار
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كـه رخصـت اهل دل را درسه حالست
فــنا و ســُكر و آن ديگــر
دَلال
اســت
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٧٣٥ |
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هـر آن كـس كاو
شناسد اين سه حالت
بدانــــد وضــــعِ الفــــاظ و دلالــــت
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تـــو را گـــر نيســـت احـــوال
مَواجـــيد
مشـــو كافـــر ز
نادانـــي بـــه تقلـــيد
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مجــــازي نيســــت احــــوال حقــــيقت
نــه هــر كــس يابــد اســرار طــريقت
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گـزاف اي دوسـت نايـد ز
اهـل تحقيق
مـر ايـن را كشـف بايـد يـا كه تصديق
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بگفــــتم وضــــع الفــــاظ و معانــــي
تــو را سربســته ، گــر
خواهــي بدانــي
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٧٤٠ |
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نظـــر كـــن
در معانـــي ســـوي غايـــت
لــــوازم را يكايــــك كــــن رعايــــت
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بـه وجــه خــاص از آن تشــبيه
مــيكــن
ز
ديگـــر وجـــههـــا تنـــزيه مـــيكـــن
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چــو شــد ايــن قاعــده يكســر مقــرر
نمــــايم زآن مثالــــي
چــــند ديگــــر
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نگــر كــز چشــمِ
شــاهد چيســت پــيدا
رعايــــت كــــن لــــوازم را بديــــنجا
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ز چشــمش خاســت بــيماري و مســتي
ز
لعلــش گشــت پــيدا عــين هســتي
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٧٤٥ |
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ز چشـم
اوسـت دلهـا مسـت و مخمـور
ز لعــل اوســت جانهــا جملــه
مســتور
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ز چشـــم او همـــه دلهـــا جگـــرخوار
لـــب لعلـــش شـــفاي جـــان بـــيمار
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بــه چشــمش گــرچه عــالم در نــيايد
لـــبش هـــر
ســـاعتي لطفـــي نمايـــد
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دمـــــي از مردمـــــي
دلهـــــا نـــــوازد
دمــــي بــــيچارگان را چــــاره
ســــازد
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بـه شـوخي جان دمد درآب و درخاك
بــه دم دادن زنــد آتــش بــر افــلاك
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٧٥٠ |
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از او هــر
غمــزه دام و دانــهئــي شــد
وز او هــر
گوشــهئــي مــيخانهئــي شــد
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ز غمــزه مــيدهــد هســتي بــه
غــارت
بــه بوســه مــيكــند بــازش
عمــارت
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ز چشــمش خــون مــا در جــوشِ دائــم
ز لعلـــش جـــان مـــا مدهـــوشِ دائـــم
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بـــه غمـــزه چشـــم
او دل مـــيربايـــد
بــه عشــوه
لعــل او جــان مــيفــزايد
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چــو از چشــم و لــبش جوئــي كــناري
مـر ايـن گـويد كـه نـه آن گـويد آري
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٧٥٥ |
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ز
غمــــزه عالَمــــي را كــــار ســــازد
بــه بوســه هــر زمــان جــان مــينــوازد
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از او يــك غمــزه ، و
جــان دادن از مــا
وز او يـــك بوســـه و
اِســـتادن از مـــا
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ز «لَمـــحٍ بِالبَصـــَر» شـــد حشـــرِ
عـــالم
ز نفـــــخ روحْ پـــــيدا گشـــــت آدم
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چــو از چشــم و لــبش انديشــه كــردند
جهانـــي مـــيپرســـتي پيشـــه كـــردند
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نــيايد در دو
چشــمش جملــه هســتي
در او چـون آيـد آخـر
خـواب و مستي
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٧٦٠ |
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وجـود مـا همـه مسـتي اسـت يـا خواب
چــه نســبت خــاك را بــا رب اربــاب |
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خـرد
دارد از ايـن صـد گـونه اِشـگُفت
كـه «ولِتُِصـنَع علـي
عَينـي» چـرا گفـت
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حـديث زلـف جانـان بـس دراز اسـت
چـه ميپرسي از او كآن جاي راز
است
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مپــرس از مــن حــديث زلــفِ پــُرچين
مجنبانـــــــيد زنجيـــــــر مجانـــــــين
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ز قــدش راســتي گفــتم
ســخن دوش
ســـر زلفـــش
مـــرا گفـــتا فـــروپوش
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٧٦٥ |
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كــژي بــر راســتي زو گشــت غالــب
وز او در پــــيچش آمــــد راهِ طالــــب
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همــــه دلهــــا از
او گشــــته مسلســــل
همــــه جانهــــا از او بــــوده
مُقَلقَــــل
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معلـــق صـــد هـــزاران دل ز
هـــر ســـو
نشـــد يـــك دل
بـــرون از حلقـــة او
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گــــر او زلفــــين مشــــكين
بَرفَشــــانَد
بـــه عـــالَم در يكـــي كافـــر نمانَـــد
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وگـــر
بگـــذاردش پيوســـته ســـاكن
نمانَــد در جهــان يــك نفــسْ مــؤمن
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٧٧٠ |
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چـــــو دامِ فتـــــنه ميشـــــد
چَنَبـــــرِ او
بــه شــوخي بــاز كــرد از
تــن ســرِ او |
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اگـر ببـريده شـد زلفـش چـه غـم بـود
كـه گـر شـب كـم شد اندر روز افزود
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چــــو او
بــــر كــــاروانِ عقــــل ره زد
بــه دســتِ
خويشــتن بــر وي گــره زد |
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نــــيابد زلــــف او يــــك
لحظــــه آرام
گهــي بــام آورد گاهـــي كــند شـــام
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ز رويوزلـف خود صدروزو شب كرد
بســي بازيچــههــاي بــوالعجب كــرد |
٧٧٥ |
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گِـــــلِ آدم در آن
دم شـــــد مخَََُُمَـــَّــر
كـــه دادش بـــوي آن زلـــف
معطـــر |
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دل مــــــا دارد از زلفــــــش
نشــــــاني
كــه خــود ســاكن نميگــردد زمانــي
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از او هــر لحظــه كــار از ســر گــرفته
ز جـــــان
خويشـــــتن دل برگـــــرفته |
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از آن
گـــردد دل از زلفـــش مشـــوش
كــه از رويــش دلــي دارد بــر آتــش
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رخ ايـنجا مظهـر حسـن خدايـي اسـت
مــراد از خــطْ جــنابِ كبريايــي اســت |
٧٨٠ |
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رخــش خطــي كشــيد انــدر نكويــي
كــه از مــا نيســت
بيــرون خوبرويــي
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خـــط آمـــد ســـبزهزار
عـــالَمِ جـــان
از آن كــــردند نــــامش دارِ حــــيوان
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ز تاريكـــئ زلفـــش روز شـــب كـــن
ز
خطَّــش چشــمة حــيوان طلــب كــن
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خِضِـــــروار از مقـــــام بـــــينشـــــاني
بخــور چــون خطّــش آب
زندگانــي
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اگـر روي و خَطَـش
بينـي تـو بـيشك
بدانـــي كثـــرت از وحـــدت يكايـــك
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٧٨٥ |
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ز زلفـــش بـــاز دانـــي كـــار عـــالَم
ز خطَّـــش بـــاز
خوانـــي سِـــرِّ مــُـبهَم
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كســي
گــر خطّــش از روي نكــو ديــد
دل مــــن روي او در خــــطِّ او
ديــــد |
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مگــر رخســار او سـَـبعَ المَثانــي اســت
كـه هـر حرفـي از او بحـر معانـي است
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نهفـــته زيـــر هـــر موئـــي از او بـــاز
هــــزاران بحــــر
علــــم از عــــالَمِ راز
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ببـــين بـــر آن قَلَـــبت عـــرش رحمـــان
ز خــــط عــــارض زيــــباي جانــــان |
٧٩٠ |
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بــر آن رخ نقطــة
خــالش بســيط اســت
كــه اصــلِ مركــزِ
دَورِ محــيط اســت
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از او شـــد خـــطِّ دَورِ
هـــر دو عـــالم
وز او شـــد خـــطِّ
نفـــس و قلـــب آدم |
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از آن حـــالِ دلِ پـــرخون تـــباه اســـت
كــه عكــسِ نقطــة خــالِ ســياه اســت |
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ز خالش حال ِدل جز خون
شدن نيست
كــز
آن منــزل رهِ بيــرون شــدن نيســت
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بــه وحــدت در نباشــد هــيچ كثــرت
دو نقطــه نــبوَد انــدر
اصــلِ وحــدت
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٧٩٥ |
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نـــدانم خـــالِ او
عكـــس دل ماســـت
و يــا دل عكــسِ خــالِ روي زيباســت
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ز عكـــس خـــال او دل گشـــت پـــيدا
و يــا عكــس
دل آنجــا شــد هــويدا
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دل
انـــدر روي او يـــا اوســـت در دل
بــه مــن پوشــيده شــد ايــن رازِ مشــكل
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اگـر هسـت ايـن دلِ مـا عكس آن
خال
چــر ا مــيباشــد آخــر مخــتلف حــال |
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گهـي چـون چشـمِ مخمورش خرابست
گهـي چون زلفِ او در اضطراب
است |
٨٠٠ |
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گهـي روشـن چو آن روي چوماه است
گهـي تاريـك چـون خـال سـياه اسـت |
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گهـي مسـجد بـوَد گاهـي كنشت است
گهـي دوزخ بـوَد گاهـي بهشـت
اسـت |
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گهــي برتــر شــود از هفــتم
افــلاك
گهـــي افـــتد بـــه زيـــرِ تـــودة خـــاك
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پــس از زهــد و ورع گــردد دگــر بــار
شــراب و شــمع
و شــاهد را طلــبكار |
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