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سوءال |
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اگــرمعــروف و عــارف ذات پــاك اســت
چـه سـودا در سـرِ ايـن م شـتِ خاك است؟ |
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جواب |
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مكـــن
بـــر نعمـــتِ حـــق ناسپاســـي
كــه
تــو حــق را بــه نــورِ حــق شناســي
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٤١٥ |
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جـز او معـروف و عارف نيست. درياب
ولــيكن خــاك مــييابــد ز
خَــور تــاب
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عجــــب نــــبوَد كــــه ذره دارد امَــــيد
هـــواي تـــابِ مهـــر و نـــورِ خورشـــيد
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بـــه يـــاد آور
مقـــام و حـــال فِطـــرت
كــز
آنجــا بــاز دانــي اصــل فكــرت
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«اَلَســتَ بِــرَبِّكُم» ايــزد كــه
را گفــت
كه بود آخر كه آن ساعت
«بَلَي»
گفت
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در آن روزي كــه گلهــا مــيسرشــتند
بــــه دل در قصــــة ايمــــان نوشــــتند
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٤٢٠ |
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اگـــر آن نامـــه
را يـــك ره بخوانـــي
هــر آن چيــزي
كــه ميخواهــي بدانــي
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تــو بســتي عقــد عهــد بندگــي دوش
ولـــي كـــردي بـــه نادانـــي فـــراموش
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كــلام
حــق بــدان گشــته اســت مُنــزَل
كــــــه يــــــادت آورد از عهــــــد اول
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اگــر تــو ديــدهاي حــق را
بــه آغــاز
در ايـــنجا هـــم
توانـــي ديـــدنش بـــاز
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صــــفاتش را ببــــين امــــروز ايــــنجا
كـــه تـــا ذاتـــش توانـــي ديـــد
فـــردا
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٤٢٥ |
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وگــرنه
رنــج خــود ضــايع مگــردان
بــــرو بنــــيوش «لاتَهــــدِي» ز قــــرآن
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نـــــدارد بـــــاورت اَكمَـــــه زِ اَلـــــوان
وگــر صــد
ســال گوئــي نقــل و بــرهان
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ســپيد و زرد و ســرخ و ســبز و كاهــي
بـــه نـــزد وي نباشـــد جـــز
ســـياهي
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نگـــر تـــا
كـــور مـــادرزادِ بــــدحال
كجـــا بيـــنا شـــود از كُحـــلِ كَحُـــال
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خـــــرد از ديـــــدنِ احـــــوالِ
عَقـــــبا
بــــَود چــــون كــــور مــــادرزادِ دنــــيا
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٤٣٠ |
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وراي عقـــــلْ طَـــــوري دارد انســـــان
كـــه بشناســـد بـــدآن
اســـرار پـــنهان
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بســـانِ
آتـــش انـــدر ســـنگ و آهـــن
نهـاده اسـت ايـزد انـدر جـان و در تـن
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چـو بـر هـم اوفـتاد ايـن سـنگ و
آهـن
ز نــورش
هــر دو عــالَم گشــت روشــن
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از آن مجمــوع پـــيدا گـــردد ايـــن راز
چـــو دانســـتي بـــرو خـــود را
بـــرانداز
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٤٣٥ |
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توئــــي تــــو
نســــخة نقــــشِ الهــــي
بجـو از خـويش هـر چيـزي كه خواهي
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