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سوءال |
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چـه جـزو است آنكه ا و از كل فزون است؟
طـــريق جســـتنِ آن جـــزو چـــون اســـت؟ |
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جواب |
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وجـود
آن جزو دان كز كل فزون است
كه
موجود است كل وين باژگون است |
٦٣٥ |
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بــــوَد موجــــود را كثــــرت
برونــــي
كــه از وحــدت نــدارد جــز درونــي |
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وجــود كــل ز كثــرت گشــت ظاهــر
كــه او در وحــدت جــزو اســت ســائر |
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نـــدارد كـــل
وجـــودي در حقـــيقت
كـه او چـون عارضـي شـد بـر
حقـيقت
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چــو كــل از روي ظاهــر هســت بســيار
بــود از جــزو خــود كمتــر بــه مقــدار |
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نــه
آخــر واجــب آمــد جــزو هســتي
كـــه هســـتي
كـــرد او را زيردســـتي |
٦٤٠ |
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وجــــود كــــل كثيــــر
واحــــد آيــــد
كثيــــر از روي كثــــرت مــــينمايــــد
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عَـرَض شـد هسـتيي كان اجتماعي است
عـَرَض سـوي عـ دم بالذات ساعي است |
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بـه هـر جـزوي
ز كـل كان نيست گردد
كــل انــدر دم ز امكــان
نيســت گــردد
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جهـان كـل اسـت و در هـر طـرف ه العين
عــــدم گــــردد و لا يبقــــي زمانــــين
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دگــــر
بــــاره شــــود پــــيدا جهانــــي
بـــه
هـــر لحظـــه زمـــين و آســـماني
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٦٤٥ |
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بـه هـر لحظـه جـوان و كهـنه
پيـر اسـت
بـه هـر دم انـدر او حشـر و
نشـير اسـت
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در آن چيـــزي دو ســـاعت مـــينـــپايد
در آن ســاعت كــه مــيميــرد بــزايد |
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ولــيكن
طامـّـت الكُبــرَي نــه ايــن اســت
كـه ايـن
يـوم عمـل وان يـوم دين است
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از آن تــا ايــن بســي فــرق
اســت زنهــار
بـــه نادانـــي مكـــن خـــود را
گـــرفتار
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نظـــر بگشـــاي در تفصـــيل و اجمـــال
نگــر در ســاعت و روز و مــه و ســال
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٦٥٠ |
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اگــر
خواهــي كــه ايــن معنــي بدانــي
تــو را هــم
هســت مــرگ و زندگانــي
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ز هـرچ آن در جهـان از زيـر و
بالاست
مــثالش در تــن و جــان تــو پيداســت
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جهـان چـون تواست يك شخص معين
تـو او را گشـته چـون جـان او تو را تن
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سـه گـونه نـوع انسـان را
ممـات اسـت
يكـي هرلحظه وآن برحسبِ ذات
است
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دو ديگــر زآن ممــاتِ اختــياري اســت
سـيم مـردن مـر او را اضـطراري اسـت
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٦٥٥ |
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چــو مــرگ و
زندگــي باشــد مقابــل
ســه نــوع آمــد حــياتش
در ســه منــزل |
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جهـــان را نيســـت مـــرگِ اختـــياري
كـــه آن را از همـــه عـــالَم تـــو داري
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ولـــي هـــر لحظـــه مـــيگـــردد مُـــبَدَّل
در
آخــــر هــــم شــــود مانــــند اول
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هــر آنــچ آن
گــردد انــدر حشــر پــيدا
ز تـــو در نـــزع
مـــيگـــردد هـــويدا
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تـنِ تـو چـون زمـين سـر آسـمان اسـت
حواسـت انجـم و خورشـيد جـان است
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٦٦٠ |
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چوكـوهاسـت استخوانهاييكه سختست
نـباتت
مـوي و اطـرافت درخـت اسـت
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تــــنت در وقــــت مــــردن از
نــــدامت
بلــــرزد چــــون زمــــين روز
قــــيامت
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دمـــاغ آشـــفته و جـــان تيـــره گـــردد
حواسـت هـم چـو انجـم خيـره گـردد
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مَسـامَت گـردد از خَـوي هـم چـو دريـا
تــو در وي غــرقه
گشــته بــي ســر و پــا
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شــود از جــانكَــنِش اي مــرد
مســكين
ز سســـتي اســـتخوانها پشـــم رنگـــين
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٦٦٥ |
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بــه هــم پيچــيده گــردد ســاق بــا ســاق
همـه جفتـي شـود از جفـت خـود طـاق
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چــو روح از
تــن بــه كلــيت جــدا شــد
زميــنت «بــاع
صَفصــَف
لاتُــرَي» شــد |
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بــــدين مــــنوال باشــــد حــــال
عــــالَم
كـه تـو در خـويش مـيبينـي در آن دم
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بقـا حـق رااسـت باقـي جمله فاني است
بـيانش جملـه در
«سـَبعُ المَثانـي» اسـت
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ُّبــه «كُــُّ مــَن
علَــيها
فــان» بــيان كــرد
لَفــي خَلــقٍ
جديــد» هــم عــيان
كــرد» |
٦٧٠ |
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بــــُـوَد ايجـــــاد و
اعـــــدامِ دو عـــــالم
چـــو خلـــق و بعـــثِ نفـــسِ ابـــنِ آدم
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هميشــه خلــق در خلــقِ جديــد اســت
و گــرچه مــدت
عمــرش مديــد اســت
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هميشـــه فـــيضِ فضـــل حـــق تعالـــي
بـــُوَد از شـــأن خـــود انـــدر
تَجلَّـــي
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از آن جانـــب بـــوَد ايجـــاد و تكمـــيل
وز ايـن جانـب بــود هـر لحظـه تــبديل
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ولـيكن چـون گذشــت ايـن طَـورِ دنــيا
بقـــــاي
كـــــل بـــــوَد در دار عقـــــبا
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٦٧٥ |
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كــه
هــر چيــزي كــه بينــي بالضــرورت
دو عــــالَم دارد از معنــــي
و صــــورت
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وصـــال اولـــين عـــينِ
فـــراق اســـت
مــر آن ديگــر ز «عِــند االله بــاق» اســت
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مظاهـــر چـــون فُـــتَد بـــر وِفـــقِ ظاهـــر
در اول
مــــينمايــــد عــــين آخـــــر
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بقــــا اســــمِ وجــــود آمــــد ولــــيكن
بـه جائـي كـآن بـود سـائر چـو
سـاكن
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هـر آنـچ آن هسـت
بالقـوه در ايـن دار
بـه فعـل آيـد در آن عـالَم بـه يـك بـار
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٦٨٠ |
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ز تــو هــر فعــل كــه اول گشــت صــادر
بــر آن گــردي
بــه بــاري چــند قــادر
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بـه
هـر بـاري اگـر نفـع اسـت اگـر ضَـر
شـــود در نفـــسِ تـــو چيـــزي
مُدَخَّـــر
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بــه عــادت حالهــا بــا
خــوي گــردد
بــه مــدت مــيوههــا خوشــبوي گــردد
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از آن آمـــوخت انســـان پيشـــههـــا را
وز آن تـــركيب
كـــرد انديشـــههـــا را
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همـــــه
افعـــــال و اقـــــوال مُدَخَّـــــر
هــــويدا گــــردد انــــدر روز
محشــــر
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٦٨٥ |
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چـــو عـــريان گـــردي از
پيـــراهن تـــن
شـــود عـــيب و هنـــر يكـــباره روشـــن |
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تـــنت باشـــد ولـــيكن بـــيكـــدورت
كــه بــنمايد
از او چــون آب صــورت
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همــــه
پــــيدا شــــود آنجــــا ضــــماير
فـــرو خـــوان آيـــت «تُبلَـــي
السّـــرائر»
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دگـــر بـــاره بـــه وفـــقِ
عـــالَمِ خـــاص
شــود اخــلاقِ تــو اجســام و اشــخاص
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چـــنان كـــاز قُـــوَّتِ عنصـــر در ايـــنجا
موالــــيد
ســــه گانــــه گشــــت پــــيدا |
٦٩٠ |
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همـــه اخـــلاق تـــو در عـــالم جـــان
گهـــي انــــوار گـــردد
گــــاه نيــــران
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تَعـَــــيُّن مـــــر تفع گـــــردد ز
هســـــتي
نمانـــــد درنظـــــر بـــــالا و پســـــتي
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نمانَــــد مــــرگت انــــدر دار
حــــيوان
بــه يــك رنگــي بــرآيد قالــب و جــان
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بــوَد پــا و ســر و چشــم تــو چــون دل
شــود صــافي ز ظلمــت
صــورت گِــل
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كـــند
انـــوار حـــق بـــر تـــو تجلـــي
ببينـــي بـــيجهـــت حـــق را تعالـــي
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٦٩٥ |
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دو عــالم را همــه بـــر هــم
زنــي تـــو
نــــدانم
تاچــــه مســــتيها كنــــي تــــو
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سـَــقاهُم رََبُّهـــُم» چـــه بـــود بيـــنديش»
«طَهورًا» چيست صافي گشتن
ازخويش
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زهــي شــربت زهــي لــذت زهــي ذوق
زهـي حيـرت زهـي دولـت زهـي شوق
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خوشـا آن دم كـه مـا بـيخـويش
باشيم
غنــــيِّ مطلــــق و
درويــــش باشــــيم
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نـه ديـن نـه عقـل نـه تقـوي نـه ادراك
فــتاده مســت و حيــران بــر ســر خــاك |
٧٠٠ |
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بهشـت و حـور و خُلـد
آنجـا چه سنجد
كـــه بـــيگانه در آن خلـــوت نگـــنجد
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چـو رويـت ديـدم و خـوردم از آن مـي
نـدانم تـا چـه خـواهد شـد
پـس از وي
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پـــي هـــر
مســـتيئـــي باشـــد خمـــاري
از ايـن انديشـه دل خـون گشـت بـاري |
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